आबिद रजा के सम्मेलन से संगठनात्मक समीकरणों पर सवाल, जिलाध्यक्ष आशीष यादव की टीम की गैरमौजूदगी बनी चर्चा; शेखूपुर की दावेदारी के बीच टिकट को लेकर भी उठे सवाल
बदायूं। समाजवादी पार्टी आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों में जुटी है, लेकिन बदायूं में पार्टी के भीतर संगठनात्मक समीकरणों को लेकर उठ रही चर्चाएं अब PDA सम्मेलनों के मंच तक पहुंचती दिखाई दे रही हैं। पूर्व मंत्री एवं सपा नेता आबिद रजा के नेतृत्व में आयोजित PDA सम्मेलन के बाद पार्टी के अंदर कथित गुटबाजी और आपसी खींचतान को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं।
सम्मेलन में सांसद आदित्य यादव की मौजूदगी रही, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा उन चेहरों की रही जो मंच और कार्यक्रम में दिखाई नहीं दिए। सपा जिलाध्यक्ष आशीष यादव और उनकी टीम की गैरमौजूदगी ने पार्टी के अंदर चल रहे समीकरणों को लेकर सवाल खड़े कर दिए।
एक ही पार्टी, PDA के दो अलग-अलग मंच
राजनीतिक रूप से सबसे अहम बात यह है कि सम्मेलन से पहले सदर विधानसभा क्षेत्र में सपा जिलाध्यक्ष आशीष यादव की अध्यक्षता में PDA से जुड़ा कार्यक्रम आयोजित हुआ और उसके अगले दिन आबिद रजा के नेतृत्व में बदायूं-शेखूपुर विधानसभा क्षेत्र का संयुक्त PDA सम्मेलन हुआ।
दोनों आयोजनों में पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं की मौजूदगी का स्वरूप अलग-अलग नजर आया। यही अंतर अब इस सवाल को जन्म दे रहा है कि क्या बदायूं सपा में PDA को लेकर भी दो अलग-अलग राजनीतिक धाराएं दिखाई दे रही हैं?
आबिद रजा बनाम जिला संगठन की चर्चा
आबिद रजा और सपा जिलाध्यक्ष आशीष यादव के बीच राजनीतिक समीकरणों को लेकर चर्चाएं नई नहीं हैं। पूर्व में भी बदायूं सपा में अलग-अलग नेताओं की दावेदारी और संगठनात्मक मतभेदों को लेकर खबरें सामने आती रही हैं।
अब 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच यह चर्चा फिर तेज है। खासकर इसलिए क्योंकि आबिद रजा की सक्रियता को शेखूपुर विधानसभा क्षेत्र से जोड़कर देखा जा रहा है, जबकि PDA सम्मेलन सदर विधानसभा क्षेत्र में आयोजित किया गया।
यही वजह है कि सम्मेलन के बाद राजनीतिक गलियारों में सवाल उठ रहा है—क्या आबिद रजा अपनी विधानसभा दावेदारी के लिए अलग राजनीतिक आधार तैयार कर रहे हैं या यह पार्टी के PDA अभियान का ही हिस्सा है?
क्या जिलाध्यक्ष की नाराजगी या सिर्फ संयोग?
सपा जिलाध्यक्ष आशीष यादव और उनकी टीम की गैरमौजूदगी को लेकर कई तरह की चर्चाएं हैं, लेकिन इसके पीछे वास्तविक कारण क्या है, इसका कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है।
इसलिए फिलहाल इसे नाराजगी या विरोध का प्रमाण मानने के बजाय संगठनात्मक दूरी को लेकर उठ रहे सवाल के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि राजनीतिक रूप से इसका संदेश जरूर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
टिकट की दावेदारी पर भी नजर
आबिद रजा की शेखूपुर विधानसभा से संभावित दावेदारी की चर्चा के बीच एक सवाल और बड़ा हो गया है—क्या जिला संगठन के साथ तालमेल के बिना उनकी टिकट की राह आसान होगी?
टिकट का अंतिम फैसला समाजवादी पार्टी का राष्ट्रीय नेतृत्व करेगा। लेकिन स्थानीय संगठन, बूथ स्तर की सक्रियता और पार्टी के प्रमुख नेताओं के बीच समन्वय विधानसभा चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऐसे में जिला संगठन की गतिविधियों और नेताओं की मौजूदगी पर निगाहें बनी हुई हैं।
महिला नेता इंदु सक्सेना के आरोपों ने बढ़ाई हलचल
PDA सम्मेलन के बाद महिला नेता इंदु सक्सेना ने सोशल मीडिया के माध्यम से महिलाओं को मंच पर पर्याप्त स्थान नहीं दिए जाने को लेकर गंभीर आरोप लगाए। उनके आरोपों ने सम्मेलन के राजनीतिक संदेश के साथ-साथ पार्टी में महिला प्रतिनिधित्व को लेकर भी बहस छेड़ दी है।
इंदु सक्सेना के आरोपों पर आयोजक पक्ष की आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आना अभी बाकी है। इसलिए उनके आरोपों को फिलहाल उनके पक्ष के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
PDA की एकजुटता के बीच संगठन की तस्वीर पर सवाल
PDA सामाजिक और राजनीतिक एकजुटता का संदेश देने के लिए आयोजित किया गया, लेकिन सम्मेलन के बाद चर्चा का केंद्र PDA से ज्यादा सपा के अंदरूनी संगठनात्मक समीकरण बन गया है।
एक तरफ जिलाध्यक्ष की अगुवाई में PDA कार्यक्रम, दूसरी तरफ आबिद रजा के नेतृत्व में अलग PDA महासम्मेलन और दोनों आयोजनों में नजर आने वाले चेहरों का अलग-अलग होना—इन घटनाक्रमों ने पार्टी के भीतर कथित गुटबाजी की चर्चाओं को हवा दी है।
2027 से पहले सपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती—एकजुटता
आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए अब बदायूं सपा के सामने सिर्फ विपक्षी दलों से मुकाबले की चुनौती नहीं है, बल्कि संगठन के भीतर बेहतर तालमेल बनाए रखने की भी चुनौती दिखाई दे रही है।
आबिद रजा की सक्रियता, जिलाध्यक्ष आशीष यादव की संगठनात्मक भूमिका, अलग-अलग PDA कार्यक्रम और विधानसभा टिकट की संभावित दावेदारियां—इन सभी को जोड़कर देखा जाए तो आने वाले महीनों में बदायूं सपा की राजनीति में कई नए समीकरण बनते-बिगड़ते दिखाई दे सकते हैं।
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या PDA के मंच पर सपा की एकजुट तस्वीर दिखाई देगी, या 2027 के टिकट की दौड़ से पहले पार्टी के भीतर चल रही राजनीतिक खींचतान और ज्यादा खुलकर सामने आएगी?






