24 दिन से टेंपो पुलिस कस्टडी में, सीजिंग की धारा पर सवाल! ट्रैफिक इंस्पेक्टर मनोज वर्मा की कार्यप्रणाली कठघरे में
जुर्माना भरने को तैयार चालक को राहत क्यों नहीं? कोर्ट के कागजों में सीजिंग का आधार नहीं होने का दावा, महीनादारी मांगने का भी आरोप; एसपी सिटी बोले—जांच कर होगी कार्रवाई
बदायूं। यातायात नियमों का पालन कराने की जिम्मेदारी जिन अधिकारियों के कंधों पर है, जब उन्हीं की कार्रवाई पर सवाल उठने लगें तो जवाबदेही तय होना भी जरूरी है। बदायूं में ट्रैफिक इंस्पेक्टर मनोज कुमार वर्मा की कार्यप्रणाली को लेकर ऐसा ही एक मामला सामने आया है। 22 सितंबर 2026 को सीज किए जाने का दावा किया गया टेंपो 24 दिन बाद भी पुलिस कस्टडी में खड़ा है। चालक वाहन छुड़ाने के लिए दफ्तरों के चक्कर काट रहा है, जुर्माना भरने को तैयार है, लेकिन टेंपो की रिहाई नहीं हो पा रही। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर वाहन को रोके रखने का कानूनी आधार क्या है?
मामला सिविल लाइंस थाना क्षेत्र के पुलिस लाइन चौराहे का बताया जा रहा है। चालक के मुताबिक, टेंपो नंबर UP-24-AT-5235 को 22 सितंबर 2026 को ट्रैफिक इंस्पेक्टर मनोज कुमार वर्मा की आईडी से सीज किया गया था। चालक जब वाहन छुड़ाने के लिए न्यायालय पहुंचा तो उसके दावे के अनुसार, वहां प्रस्तुत कागजातों में केवल जुर्माने की कार्रवाई दर्ज थी, जबकि वाहन सीज करने की धारा का स्पष्ट उल्लेख नहीं था।
सीज किया तो किस धारा में, रोका है तो किस आधार पर?
यह इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल है। यदि वाहन को नियमानुसार सीज किया गया है तो संबंधित अधिकारी को उसका स्पष्ट कानूनी आधार बताना चाहिए। वहीं, यदि दस्तावेजों में केवल जुर्माने की कार्रवाई दर्ज है, तो वाहन 24 दिनों से पुलिस कस्टडी में खड़ा रहने की वजह भी सामने आनी चाहिए।
आखिर ऐसी कौन-सी कार्रवाई है, जिसका सामना चालक को करना पड़ रहा है, लेकिन जिसका स्पष्ट आधार उसे कागजों में दिखाई नहीं दे रहा? क्या विभाग के रिकॉर्ड और मौके पर की गई कार्रवाई में कोई अंतर है? या फिर वाहन रिलीज करने की प्रक्रिया में कहीं कोई अड़चन है? इन सवालों का जवाब यातायात विभाग को देना चाहिए।
महीनादारी के आरोप ने बढ़ाई मामले की गंभीरता
मामले को और गंभीर बनाने वाला आरोप टेंपो चालक ने लगाया है। चालक का कहना है कि जब वह वाहन छुड़ाने के लिए ट्रैफिक कार्यालय पहुंचा तो कथित तौर पर उससे कहा गया कि यदि टेंपो चलाना है तो महीनादारी देनी पड़ेगी। यह आरोप चालक की ओर से लगाया गया है और इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। संबंधित अधिकारी का पक्ष सामने आने के बाद ही इस पर स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
यदि चालक का यह आरोप जांच में सही पाया जाता है, तो यह केवल एक टेंपो की रिहाई का मामला नहीं रहेगा, बल्कि यातायात विभाग की जवाबदेही और कार्यप्रणाली से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन जाएगा। आखिर नियमों के तहत कार्रवाई होनी चाहिए या किसी चालक को कथित तौर पर अतिरिक्त रकम देने के लिए मजबूर होना पड़ेगा? इस सवाल की निष्पक्ष जांच जरूरी है।
वकील ने नोटिस भेजा, फिर भी जवाब का इंतजार!
चालक के अनुसार, उसके वकील ने नोटिस भेजकर पूछा है कि टेंपो को किस धारा के तहत सीज किया गया और उसे पुलिस कस्टडी में रखने का आधार क्या है। चालक का आरोप है कि नोटिस का अब तक जवाब नहीं मिला। वह कहता है कि जो जुर्माना बनता है, उसे भरने के लिए तैयार है, फिर भी उसका वाहन वापस नहीं मिल रहा।
अब सवाल यह है कि जब मामला दस्तावेजों के आधार पर स्पष्ट किया जा सकता है, तो चालक को लगातार कार्यालयों के चक्कर क्यों काटने पड़ रहे हैं? यदि कार्रवाई नियमानुसार है, तो विभाग को रिकॉर्ड सामने रखकर स्थिति साफ करनी चाहिए। और यदि प्रक्रिया में कोई कमी है, तो उसे दूर करने में देरी क्यों?
अधिकारियों की निगरानी पर भी सवाल
ट्रैफिक इंस्पेक्टर की आईडी से कार्रवाई होने का दावा है, चालक गंभीर आरोप लगा रहा है और वाहन लंबे समय से पुलिस कस्टडी में खड़ा है। इसके बावजूद मामला उच्च अधिकारियों के संज्ञान में क्यों नहीं पहुंचा, यह भी जांच का विषय है। क्या अधीनस्थ स्तर पर हुई कार्रवाई की नियमित समीक्षा नहीं होती? क्या वाहन सीज करने और उसे रिलीज करने से संबंधित रिकॉर्ड का मिलान किया गया? या फिर शिकायत सामने आने के बाद ही विभाग सक्रिय होगा?
इन सवालों का जवाब केवल आश्वासन से नहीं, बल्कि निष्पक्ष जांच और दस्तावेजों के परीक्षण से मिलना चाहिए। यातायात नियमों का पालन कराना जरूरी है, लेकिन हर कार्रवाई का कानूनी आधार स्पष्ट होना भी उतना ही जरूरी है।
एसपी सिटी बोले—जानकारी कराकर होगी कार्रवाई
इस संबंध में एसपी सिटी अभिषेक कुमार सिंह ने कहा कि मामला उनके संज्ञान में नहीं है। उन्होंने कहा कि यदि ऐसा कोई मामला है तो उसकी जानकारी कराकर पूरे प्रकरण में कार्रवाई की जाएगी।
अब निगाहें अधिकारियों की जांच पर टिकी हैं। क्या टेंपो की सीजिंग का आधार स्पष्ट होगा? क्या चालक के महीनादारी मांगने के आरोप की जांच होगी? और क्या 24 दिनों से पुलिस कस्टडी में खड़े वाहन को लेकर जिम्मेदारी तय की जाएगी?
बदायूं में अब सवाल सीधा है—नियमों के नाम पर कार्रवाई करने वाले अधिकारियों से उनके अपने नियमों और रिकॉर्ड का हिसाब कौन मांगेगा?







